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Saturday, 4 July 2015

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अब यह तो पक्का था कि बाबा ने मेरे स्तन, मेरा पेट और जांघें तो देख ही ली थी और उन्होंने यह भी देख लिया होगा कि मैंने अपनी नाईटी के नीचे कुछ नहीं पहना था।
पानी के साथ बाबा ने अपने झोले में से कुछ निकाल कर खाया और पानी पीने के बाद बाबा बोले- जय हो।
मैंने पूछा- बाबा क्या लोगे?
अब यह डबल मीनिंग बात थी कि बाबा रोटी खाओगे या बोटी खाओगे।
मैंने मन ही मन सोचा अगर बाबा मेरे से सेक्स करे तो कैसा हो? क्या ये मान जाएंगे?
बाबा कुछ संभलते हुये बोले- जो तेरी श्रद्धा है बच्चा।
अब गेंद मेरे पाले में थी कि मैं बाबा को क्या दूँ। खैर मैं रसोई में गई, और मैं एक परांठा बनाया और दही और आचार के साथ बाबा को दिया।
जब खाना देने को झुकी तो बाबा ने फिर से मेरे झूलते स्तनो कों बड़ी हसरत से निहारा।
मैंने पूछा- बाबा और लोगे?
तो बाबा ने बड़े अधिकारपूर्ण कहा- एक और लूँगा, बच्चा।



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हाँ तो मैं नाईटी में लेटी टीवी देख रही थी कि तभी डोरबेल बजी। मैंने बाहर जाकर देखा, बाहर एक लंबे चौड़े साधू बाबा खड़े थे, सर पे दूध जैसे सफ़ेद बाल, सफ़ेद दाढ़ी मूंछ, भगवा चोला, हाथ में चिमटा, कमण्डल!
मैंने पूछा- क्या है बाबा?
वो बोले- बेटी बाबा भूखा है, कुछ खाने को दे।
पहले तो मैंने बाबा को भगाने की सोची मगर मैंने देखा कि बाबा तो मेरी नाईटी में आज़ाद झूल रही मेरी छातियों को ताड़ रहा है और वैसे भी मेरे निप्पल दिख रहे थे।
मैंने बाबा को मना कर दिया- बाबा अभी कुछ बनाया नहीं।
मगर बाबा नहीं माने- बच्चा रात की बची हुई ही दे दे।
फिर मैंने सोचा कि पता नहीं बेचारा कब से भूखा होगा, मैंने उसे अंदर बुला लिया- आओ, अभी बना देती हूँ।
मैंने बाबा को अपने पीछे आने को कहा। जब मैं जा रही थी तो मुझे ऐसे लग रहा था जैसे बाबा पीछे से आते आते मेरे कूल्हों को घूर रहे थे। अब मेरे चूतड़ कुछ हैं भी भारी, तो सभी देखते हैं, पर बाबा के घूरने से मेरे बदन में झुरझुरी सी हो रही थी और सच कहूँ मेरे मन में तरह तरह के खयाल आ रहे थे।
बाबा को अंदर बैठा कर मैं रसोई में पानी लेने गई, बाबा फर्श पर ही बैठ गए, मैं जब पानी का गिलास देने के लिए झुकी तो बाबा ने मेरे नाईटी के गले के अंदर तक निगाह मार कर मेरे सारे गोरे बदन का जायजा लिया।
मुझे अपनी पीठ पर सनसनी सी महसूस हुई।

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बात ऐसे बनी कि मेरी कहानी जंगल में चूत का मंगल पढ़ कर एक श्रीमती जी ने मुझे ईमेल भेज कर कहा कि वो भी ऐसे ही किसी बाबा से सेक्स करना चाहती हैं और चाहती हैं कि मैं उनके और बाबा के सेक्स की कहानी लिख कर भेजूँ।
एक कहानी का आइडिया मेरे दिमाग में था तो मैं यह कहानी आपके और उनके मज़े के लिए लिख रहा हूँ। इसमें कोई भी सच्चाई नहीं है क्योंकि मैं नहीं जानता कि वो मोहतरमा कहाँ रहती हैं, उनका जो नाम उन्होंने मुझे बताया है वो भी सही है या नहीं, पर हमें क्या, हमने तो बस मज़े लेने हैं।
तो कहानी का मज़ा लें।
मेरा नाम सुरेखा वाघमारे है और मैं 38 साल की सुंदर, सेक्सी, हॉट, गदराई मानो के सब कुछ हूँ। बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं, पति का कूरियर का बिज़नस है। सुबह सब चले जाते हैं तो मैं सारा दिन घर में अकेली ही रहती हूँ।
ऐसी ही एक सुबह की बात है, मैं सबको भेज कर नाश्ता करके बैठी टीवी देख रही थी, कामवाली बाई अभी आई नहीं थी और मैं उसका ही इंतज़ार कर रही थी इसीलिए अभी तक नहाई भी नहीं थी और नाईटी में ही थी। नाईटी के नीचे मैं कुछ भी नहीं पहनती, न ब्रा, न चड्डी, न सलवार न पेटीकोट, मुझे रात को बिलकुल फ्री होकर सोने की आदत है, इसीलिए अक्सर मैं रात को नाईटी भी उतार देती हूँ।

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बाबा ने बड़े आराम से उसके साथ किया, जब उसको भी मज़ा आने लगा तो उसने भी अपना ब्लाउज़ ऊपर उठा कर अपनी चूचियाँ निकाल कर बाबा को दी मगर बाबा ने नहीं पी।
बाबा बोले- चूचियाँ तो तेरी मालकिन की मस्त हैं।
मैं ऊपर लेटी सोनिया की चुदाई देखती रही, वो तो बस दो मिनट में ही स्खलित हो गई, उसके बाद बाबा ने सोनिया से पूछ कर उसकी चूत में वीर्यपात किया।
जब बाबा ने अपना लण्ड बाहर निकाला तो वो तब उतना ही तना हुआ था, बाबा वीर्य, चू कर उसकी चूत से बाहर टपक रहा था।
आज पहली बार था कि एक नौकरानी और मालकिन एक साथ एक दूसरे के सामने चुदी थी और दोनों नंगी लेटी थी।
चुदाई करने के बाद बाबा जब जाने लगे तो बोले- जब मैं तुम्हारे घर में आया था न… तभी मुझे आभास हो गया था कि आज मुझे सम्भोग सुख मिलेगा।
इसके बाद बाबा हर हर कहते चले गए और फिर कभी लौट के नहीं आए।

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मगर मेरी सुनने वाला कौन था, बाबा तो धक्के पे धक्का मार रहे थे, मेरी पीठ पर बाबा ने दोनों हाथों से मुट्ठियाँ भींच ली, मेरी पीठ का मांस बाबा के हाथों में था और मुझे बहुत दर्द हो रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे मेरा बलात्कार हो रहा हो, मैं तड़प रही थी, मेरी आँखों से आँसू निकल रहे थे, और चूत पानी पानी थी।
मैं इस दर्दनाक सुख की आज पहली बार अनुभूति कर रही थी। बाबा ने नीचे से हाथ डाल एक हाथ से मेरा स्तन पकड़ लिया और मेरे निप्पल को अपनी उँगलियों से मसलने लगे और दूसरे हाथ से मेरी चूत का दाना मसलने लगे।
यह तो और भी तकलीफ़देह था क्योंकि वो बहुत ही ज़ोर ज़ोर से मसल रहे थे। बस अब मैं इस आनन्द को नहीं सह सकती थी और मैं नीचे असहाय पड़ी एक बार और सखलित हो गई।
जब मैं स्खलित हुई तो मैंने बाबा से कहा- बाबा, मैं दूसरी बार झड़ गई हूँ, अब और नहीं कर सकती।
बाबा मुझे लेटा छोड़ कर उठ गए मगर मुझमें उठने की भी ताकत नहीं थी।
बाबा ने कामवाली को पुकारा- आओ बच्चा, तुम भी बाबा का आशीर्वाद लो।
मगर वो पहले ही बोली- बाबा, मुझे बस आशीर्वाद ही देना, मैं इतना ज़ोर के सहन नहीं कर पाऊँगी, मैं तो मर ही जाऊँगी।
बाबा मुस्कुराए और उन्होंने ने सोनिया को नीचे कालीन पर ही लिटाया, खुद उसकी साड़ी ऊपर उठाई और अपना लण्ड उसकी चूत में डाल दिया।

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जब बाबा का लण्ड मेरे अंदर जा कर लगता तो मुझे ऐसे लगता जैसा उनका लण्ड मेरी आंतड़ियों में जा कर लग रहा है, वो मेरे गाल होंठ नाक कान ठोड़ी पूरा चेहरा चाट गए, उनके थूक से मेरे दोनों स्तन भीगे पड़े थे, और उन पर उनके होंठो के चूसने और दाँतो के काटने के निशान भी यहाँ वहाँ बन रहे थे।
मगर बाबा की ताकत का कोई मुकाबला नहीं था, वो तो ऐसे पेल रहे थे जैसे उन्हें बरसों बाद कोई फ़ुद्दी मिली हो।
मैंने पूछा- बाबा यह बताओ, आखरी बार कब किया था?
बाबा बोले- तीन साल से ऊपर हो गए, तुम्हारे जैसी कोई, बेटा मांगने आई थी।
मैंने पूछा- तो दे दिया बेटा।
‘बिल्कुल!’ बाबा बड़े उत्साहित होकर बोले- एक नहीं, दो दो बेटे दिये उसको।
बाबा ने कहा तो पीछे से आवाज़ आई- बाबा मेरे को भी बेटा चाहिए।
हम दोनों एकदम से सन्न रह गए, पीछे कामवाली सोनिया खड़ी थी, तो क्या उसने सब कुछ देख लिया था?
अब मैं तो खुद को छुपा भी नहीं सकती थी।
बाबा बोले- अवश्य बच्चा, पहले यह काम निपटा लूँ, उसके बाद तुमको भी आशीर्वाद देकर जाऊँगा।
मुझे बहुत शर्म आई कि कामवाली सोनिया क्या सोचेगी, मगर अब क्या हो सकता था, सो मैंने बाबा से कहा- बाबा जल्दी से निपटाओ।